शनिवार, 17 मई 2014


२२ २२ २२ २२

 

क्या तुमने ये सोचा पगली

गर मैं तेरा होता पगली

 

तेरी यादें फूलों जैसी

कांटे होते  रोता पगली

 

इन आँखों के वादे पढ़कर

बन बैठा मैं झूठा पगली

 

मैं तो तेरा साया हूँ ,अब

तू है मेरी काया पगली

 

तेरी बातें तू ही जाने

मैं तो हूँ बस तेरा पगली

 

 

राहों पर यूँ नज़र बिछाना

गुमनाम करे दीवाना पगली

 

 
ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

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