आपसे जब दोस्ती होने लगी
हाँ गमो में अब कमी होने लगी
रोज की ये दौड़ रोटी के लिए
भूख के घर खलबली होने लगी
आप मेरे हम सफ़र जब से हुए
ज़िन्दगी मेरी भली होने होने लगी
रख दिए कागज़ में सारे ज़ख्म जब
सूख के वो शायरी होने लगी
शहर भर में ज़िक्र है इस बात का
पीर की चादर बड़ी होने लगी
फूल तितली चिड़िया बेटी के बिना
कैसे ये दुनिया भली होने लगी
सर्द दुपहर उम्र की है साथ में
याद स्वेटर ऊनी सी होने लगी
ज़ख्म अब कहने लगे 'गुमनाम' जी
आपसे अब दोस्ती होने लगी
5 टिप्पणियां:
☆★☆★☆
रोज की ये दौड़ रोटी के लिए
भूख के घर खलबली होने लगी
रख दिए कागज़ में सारे ज़ख्म जब
सूख के वो शायरी होने लगी
वाह !
अच्छी ग़ज़ल कही है
गुमनाम साहब !
थोड़ा-सा अपना परिचय भी दे देते तो कृपा होती ...
आपकी अगली रचना की प्रतीक्षा रहेगी...
मंगलकामनाओं सहित...
-राजेन्द्र स्वर्णकार
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