सोमवार, 21 अप्रैल 2014


आपसे जब दोस्ती होने लगी

हाँ गमो में अब कमी होने लगी

 

 

रोज की ये दौड़ रोटी के लिए

भूख के घर खलबली होने लगी

 

आप मेरे हम सफ़र जब से हुए

ज़िन्दगी मेरी भली होने होने लगी

 

 

रख दिए कागज़ में सारे ज़ख्म जब

सूख के वो शायरी होने लगी

 

 

शहर भर में ज़िक्र है इस बात का

पीर की चादर बड़ी होने लगी

 

 

फूल तितली चिड़िया बेटी के बिना

कैसे ये दुनिया भली होने लगी

 

 

सर्द दुपहर उम्र की है साथ में

याद स्वेटर ऊनी सी होने लगी

 



 

ज़ख्म अब कहने लगे 'गुमनाम' जी

आपसे अब दोस्ती होने लगी

5 टिप्‍पणियां:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…



☆★☆★☆



रोज की ये दौड़ रोटी के लिए
भूख के घर खलबली होने लगी

रख दिए कागज़ में सारे ज़ख्म जब
सूख के वो शायरी होने लगी

वाह !
अच्छी ग़ज़ल कही है
गुमनाम साहब !

थोड़ा-सा अपना परिचय भी दे देते तो कृपा होती ...

आपकी अगली रचना की प्रतीक्षा रहेगी...
मंगलकामनाओं सहित...
-राजेन्द्र स्वर्णकार


Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…



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Mithilesh dubey ने कहा…

लाजवाब लिखा है आपने।

Mithilesh dubey ने कहा…

कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें।

gumnaam pithoragarhi ने कहा…

thanx dosto